(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    


॥ श्रीः ॥
10.14. अध्यायः 014
Mahabharata - Sauptika Parva - Chapter Topics
अर्जुनेन कृष्णाज्ञया द्रौण्यस्त्रप्रत्यस्त्रप्रयोगः॥ 1 ॥


Mahabharata - Sauptika Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 10-14-0x(5291)(64629)
इङ्गितेनैव दाशार्हस्तस्याभिप्रायमादितः।
द्रौणेर्बुद्धा महाबाहुरर्जुनं प्रत्यभाषत॥ 10-14-1(64630)
अर्जुनार्जुन यद्दिव्यमस्त्रं ते हृदि वर्तते।
द्रोणोपदिष्टं तस्यायं कालः सम्प्रति पाण्डव॥ 10-14-2(64631)
भ्रातॄणामात्मनश्चैव परित्राणाय भारत।
विसृजैतत्त्वमप्याजावस्त्रमस्त्रनिवारणम्॥ 10-14-3(64632)
केशवेनैवमुक्तोऽथ पाण्डवः परवीरहा।
अवातरद्रथात्तूर्णं प्रगृह्य सशरं धनुः॥ 10-14-4(64633)
पूर्वमाचार्यपुत्राय ततोऽनन्तरमात्मने।
भ्रातृभ्यश्चैव सर्वेभ्यः स्वस्तीत्युक्त्वा परन्तपः॥ 10-14-5(64634)
देवताभ्यो नमस्कृत्य गुरुभ्यश्चैव सर्वशः।
उत्ससर्ज शिवं ध्यायन्नस्त्रमस्त्रेण शाम्यताम्॥ 10-14-6(64635)
ततस्तदस्रं सहसा सृष्टं गाण्डीवधन्वना।
प्रजज्वाल महार्चिष्मद्युगान्तानलसन्निभम्॥ 10-14-7(64636)
तथैव द्रोणपुत्रस्य तदस्त्रं तिग्मतेजसः।
प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमण्डलसंवृतम्॥ 10-14-8(64637)
निर्घाता बहवश्चासन्पेतुरुल्काः सहस्रशः।
महद्भयं च भूतानां सर्वेषां समजायत॥ 10-14-9(64638)
सशब्दमभवद्व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम्।
चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा॥ 10-14-10(64639)
तावस्त्रतेजसा लोकांस्त्रासयन्तौ ततः स्थितौ।
महर्षी सहितौ तत्र दर्शयामासतुस्तदा॥ 10-14-11(64640)
नारदः सर्वधर्मात्मा भरतानां पितामहः।
उभौ शमयितुं वीरौ भारद्वाजधनञ्जयौ॥ 10-14-12(64641)
तौ मुनी सर्वधर्मज्ञौ सर्वभूतहितैपिणौ।
दीप्तयोरस्रयोर्मध्ये स्थितौ परमतेजसौ॥ 10-14-13(64642)
तदन्तरमनाधृष्यावुपगम्य यशस्विनौ।
आस्तामृषिवरौ तत्र ज्वलिताविव पावकौ॥ 10-14-14(64643)
प्राणभृद्भिरनाधृष्यौ देवदानवसम्मतौ।
अस्त्रतेजः शमयितुं लोकानां हितकाम्यया॥ 10-14-15(64644)
ऋषी ऊचतुः। 10-14-16x(5292)
महास्त्रविदुषः पूर्वे येऽप्यतीता महारथाः।
नैतदस्रं मनुष्येषु तैः प्रयुक्तं कथञ्चन।
किमिदं साहसं वीरौ कृतवन्तौ महात्ययम्॥ ॥ 10-14-16(64645)

इति श्रीमन्महाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वमि चतुर्दशोऽध्यायः॥ 14 ॥


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